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पर्यावरण केंद्र क्यों ?

वैश्वीकरण, उदारीकरण तथा निजीकरण एवं मुक्त व्यापार के परिप्रेक्ष्य में भारत में औद्योगिक क्षेत्र तेज़ परिवर्तन के दौर से गुज़र रहा है। परिणामस्वरूप मानकों, गुणवत्ता तथा प्रभावशीलता में पहले से कहीं अधिक ज़ोर दिया जा रहा है। खास तौर पर निर्यात के मामले में पर्यावरण अनुकूलन पर लगातार अधिक ध्यान दिया जा रहा है। बड़े उद्योगों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के के साथ कड़ी प्रतिस्पर्धा के कारण यह स्थिति काफी अधिक पेचिदा हो गई है।

नतीजतन लघु और मध्यम उद्योग संकटों का सामना कर रहे हैं। मोटे तौर पर कहा जाए, तो औद्योगिक प्रदूषण का संबंध खास तौर पर बड़ी विनिर्माण इकाइयों से है। इस यह धारणा मज़बूत होती गई कि कहीं भी कोई बड़ी उद्योग इकाई होती हैं, तो वहाँ पर एक प्रमुख पर्यावरणीय दुर्घटना अवश्य होती है। दिलचस्प बात यह है विश्वभर में लघु तथा मध्यम उद्योग इकाइयों की ओर से फैलाये जा रहे प्रदूषण के प्रभाव को समझने के लिए पिछले पाँच वर्षों से खास तौर पर ध्यान दिया जा रहा है।

इस परिप्रेक्ष्य में बड़े विनिर्माण उद्यमियों ने उत्सर्जन तथा प्रवाही रासायनिक द्रव को नियंत्रित करने के लिए अधिकारियों को अपेक्षाकृत आसान लक्ष्य प्रदान किया है। हालाँकि लघु तथा मध्यम इकाइयों की संख्या काफी अधिक होने के अलावा उनकी विनिर्माण गतिविधियों में भिन्नता, विस्तृत क्षेत्र तथा अनुसंधान एवं विकास के लिए पर्याप्त निधि नहीं होने के कारण एक पूरी तरह भिन्न तस्वीर सामने लायी है। इतना ही नहीं, इनमें से कई इकाइयाँ महत्वपूर्ण शहरों के बीचोंबीच बसी हैं, जिससे पर्यावरणीय हानि के साथ ही मानव स्वास्थ्य समस्याओं जैसे भयावह परिणामों का खतरा बढ़ गया है।

लघु उद्योग विकास फिलहाल संक्रमण के दौर से गुज़र रहा है। उनका आधुनिकीकरण करने के साथ ही उन्हें अंतर्राष्ट्रीय स्तर के अनुरूप प्रतिस्पर्धी बनाना प्रमुख नीतिगत उद्देश्य हैं। इसके अंतर्गत देश में संसाधन संरक्षण को मज़बूत बनाने एवं सफाई प्रक्रिया प्रौद्योगिकियों को प्रोत्साहित करने के लिए भारत सरकार के पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने अपनी पर्यावरण नीति में एक स्वागत योग्य परिवर्तन किया है। लघु उद्योग क्षेत्र में अत्यधिक प्रदूषण फैलाने वाली इकाइयाँ औद्योगिक उत्पादन में योगदान, रोज़गार उत्पादन तथा निर्यात वृद्धि के नज़रिये से महत्वपूर्ण है। इनमें से कुछ प्रमुख समूह इस प्रकार हैं –

रासायनिक एवं सम्बद्ध उद्योग, चमड़ा उद्योग, वस्त्र प्रकिया, नशीली दवाइयों तथा अन्य औषधियों का उत्पादन करने वाली इकाइयाँ, कृषि-रासायनिक और खाद्य प्रसंस्करण उद्यम शामिल

प्रदूषण को एकीकृत दृष्टिकोण से देखने की ज़रूरत है। कारखानों से बहने वाला रासायनिक द्रव, ठोस कचरे तथा धुएं पर समुचित प्रक्रिया और उपकरणों के ज़रिये उपचार करने की ज़रूरत होती है। देश के विभिन्न इलाकों में लघु उद्योगों के बारे में विभिन्न अनोखी पहलों के अलावा प्रबंधन गतिविधियों को अंजाम दिया जा रहा है। विभिन्न इलाकों तथा भिन्न-भिन्न उद्योगों में सफलता के स्तर का आकलन किया जा रहा है। पर्यावरणीय अंकेक्षण तथा प्रदूषण विरोधी प्रावधानों में उद्यमों की भागीदारी को उद्यमों के बीच प्रदूषण के खिलाफ जागरूता लाने और और उन्हें चरणबद्ध तरीके से कार्यान्वयन प्रक्रिया के उच्च स्तर तक प्रोत्साहित करने के एक महत्वपूर्ण अंश के रूप में पहचाना गया है।

लघु उद्योगों से प्रदूषण की गुणवत्ता तथा उसकी मात्रा के बारे में किसी भी प्रकार के अधिकारिक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। हालाँकि लघु उद्योग इकाइयों की अधिक संख्या के कारण प्रदूषण का अधिकम स्तर खतरे संकेतक को भी पार कर रहा है। हाल ही में न्यायालयीन तथा नियामक के हस्तक्षेप के माध्यम से स्खलित इकाइयों को बंद करने, दंडित करने तथा उनका स्थानांतरण करने के किये गये कठोर उपायों से उद्यमियों के बीच निश्चित ही कुछ हद तक चिंता देखी जा रही है। लघु और मध्यम उद्योगों के विकास तथा आधुनिकीकरण का एक प्रमुख संस्थान होने के नाते निसिएट ने यह आवश्यकता और समय की माँग को महसूस किया और लघु तथा मध्यम उद्यमों के बारे में पर्यावरणीय चिंताओं को समर्पित एक विशेष केंद्र की स्थापना करने का निर्णय लिया।

लक्ष्य

इस केंद्र का मुख्य लक्ष्य प्रदूषण की रोकथाम और नियंत्रण की तकनीकों के माध्यम से लघु तथा मध्यम उद्यमों के स्थिर विकास को प्रोत्साहित करना।

उद्देश्य

* पर्यावरण प्रबंधन के लिए आवश्यकता आधारित प्रशिक्षण कार्यक्रमों, कार्यशालाओं तथा संगोष्ठियों की रूपरेखा तैयार कर उनका संचालन करना।
* सफाई प्रौद्योगिकियों के बारे में क्लियरिंग हाउस के समान कार्य करना।
* पर्यावरण तथा प्रदूषण नियंत्रण के क्षेत्र में अनुसंधान एवं विकास सुविधा को विकसित करने के लिए अनुसंधान गतिविधियों को अंजाम देना।
* राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के सहयोग से एक संस्थागत नेटवर्क की स्थापना करना।
* विभिन्न प्रकार के स्तर और मूल्यांकन अध्ययनों को अंजाम देना तथा परामर्श सेवाओं का विस्तार करना।
* पर्यावरणीय सामग्री तथा सेवाओं के क्षेत्र में उद्यमिता को बढ़ावा देना।
* आपूर्ति धारा की हरित अवदारणा को प्रोत्साहित तथा मज़बूत करना।